रविवार, 14 जुलाई 2024

कोई एक को।


कोई एक कहूँगा 

साथ चलेंगे, 

मैं अकेला नही जाना चाहता पहाड़। 

अकेले देखे जाने का डर,

हमेशा लगता है,

पहाड़ को। 


हम जब भी मिले, 

कोई एक को लेकर मिले। 

दोनों के अकेले मिलने मे 

दोनों के अकेलेपन के मिल जाने का डर।


शुरू में


सब शुरू होने की संभावनाओ में,

एक 

जगह थी। 

जगह से दो लो की जगह दूर थी।

 

लदाख के लिए।

 कोई भी,

(बहुत दूर का एक गाँव)

एक भूरा पहाड़ 

बच्चा भूरा और बूढ़ा पहाड़ 

साँझ को लौटती भेड़ 

दूर से लौटती शाम 

रात से पहले का नीला पहाड़ 

था वही भूरा पहाड़। 


भूरा बच्चा,

भूरा नहीं,

नीला पहाड़, गोद में लिए, आँखों से। 


उतर आता है शहर 

बाजार में थैला बिछाए,

बीच में रख देता है, नीला पहाड़। 


और बेचने के बाद का,

बचा नीला पहाड़ 

अगली सुबह 

जाकर मिला देता है,

उसी भूरे पहाड़ में। 


गुरुवार, 11 जुलाई 2024

आम पेड़

आम के 6 पेड़ थे

यहीं बताते थे पापा, हर बार 

दो मेरे, दो छोटे भाई के, एक उनका 

और एक माँ का पेड़।

स्टेशन से घर के बीच में 

हर बार दिखाते थे

कभी तीन चौसा, दो दशहरी एक आम्रपाली

कभी तीन आम्रपाली एक चौसा दो दशहरी

              कभी नहीं देखे 

              कभी नहीं चढ़े

घर की जल्दी में

शहर के ही खायें आम

माना की ये है, छः पेड़ वहीं

एक टूट कर बिका है, अभी 

बूढ़ा आम पेड़

अब बस यहीं,

किसके हिस्से का पेड़ 

जो बूढ़ा हुआ, टूट गया और बिक गया।


सोमवार, 30 जनवरी 2023

चिल्लर


माँ कसम

बेमौसम की बरसात में 

हर कोई नही खाता पकौड़े।

किसान ज़हर कहा लेते हैं

नेता खा लेते हैं flood relief fund

और लड़के प्यार में झूठी माँ कसम

ताकि शाम को किसी के साथ खा सके subway।


लड़की

एक लड़की घर लौट रही हैं

कथित वाक्य में लड़की घर लौट रही हैं,

पूर्णतः लौटी नही हैं।

लौट रही है और सही सलामत लौट जाएगी 

के भेद को समाज कहा जाएगा।




love letters.


19 का पहाड़ा

तुम्हे याद करना

19 के पहाड़े जितना कठिन हैं

और भूल जाना है 

जैसे माँ जरूरी बताया हुआ कोई काम

तुम्हे छुआ तो जाना balance sheet tally कर लेने से भी और बहुत सुख बाकी है दुनिया मे

पर एक सुबह तुम आसानी से उठकर चली गई

बस उतनी ही आसानी से मैंने 2 का पहाड़ा याद किया था।



प्रेम कविता

कितनी ही प्रेम कविताएँ

प्रेम पत्र बनकर

किताबों में मर गई या जला दी गई।



नासमझ

तुम्हारे जाने का कारण उतना ही नासमझ हैं

जितना बचपन की की ये बहस

अगर पृथ्वी घूमती हैं

तो हम क्यों नही घूमते।


इंतज़ार

फिर काटे गए हज़ारो पेड़

सैंकड़ो बनाए गए उनके कागज़

पचासों लिखी उन पर चिट्ठियां।

स्याही से रंगे हाथों ने 

करोड़ो बार लिखा उन पर प्रिय/ प्रियवर

और फिर गलत पते पर भेजकर

मरते दम तक किया हमने इंतज़ार।

शुक्रवार, 18 जून 2021

दोपहर दिन का सबसे उदास वक़्त होता है।

Page No. 241

दोपहर दिन का उदास वक्त होता है, रद्दी के एक नूज़्पैपर का अधूरा आर्टिकल था, अधूरा इसलिए क्युकी अमरूदवाले ने उतना ही फाड़कर दिया था, अमरूद उतने खास नहीं थे पर ये बात हमेशा रह गई, दोपहर सच मे इतनी उदास थी भी, अलग अलग तर्क दिमाग मे चल रहे थे इतने मे चलती हुई बगल वाली रानी आंटी आई और मम्मी को दोपहर की गहरी नींद मे से उठा दिया ये बताने के लिए की उनका लड़का पुणे मे constable लग गया है, यकीन मानिए मैं झूठ नहीं बोल रहा उस वक़्त मैं अपना linkedin अपडेट कर रहा था, बाकी दोपहर का पता नहीं पर ये वाली पक्का उदास थी। पापा भी हमेशा दोपहर मे ही कॉल किया करते थे, की क्या चल रहा है, खाना खा लिए?, मम्मी सो रही है क्या?, तुम मत सोना, अपना cv भेज दो मेरे बॉस ने मांगा है, मैंने बात कर ली है और न न जाने क्या पर हर दिन यही मिलते जुलते सवाल, आपको क्या लगता है पापा भी दोपहर को उदास रहते है। 

आप लोगों को मानना पड़ेगा की ये सब मेरी autobiography का हिस्सा है, ये मेरे हिस्से के भगवान को भी पता नहीं होगा। हा ‘हिस्से का भगवान’, मैं मानता हूँ की भगवान है, जैसी मेरी ज़िंदगी है मानना बनता है, नानी के स्वर्गवास के बाद मैं और मम्मी दिल्ली से पटना जा रहे थे, दोपहर मे ट्रेन के कोच मे आग लग गई। 74 मे से 54 लोग शाम तक मर गए, उनके फेफड़ों मे काफी धुआ जा चुका था। बाकी लोग icu मे, अकेला मैं था जिसके सिर पर 4 टाके लगे थे और बाहर सिगरेट की बहुत सारी दुकान पर marlboro ढूंढ रहा था, इतने मे फोन आया की माँ जो ICU मे थी नहीं रही। 

आप लोगों को लग सकता है ये सब कुछ झूठ है, पर आपको याद रहे मैं एक भारतीय हूँ और यहा मैं अपनी माँ के बारे मे बात कर रहा हूँ। मुझे लगा माँ के हिस्से का भगवान हार गया, क्योंकि भगवान एक होता तो सब जिंदा होते और marlboro ढूंढते या ढूंढ सकते थे। भगवानों का एक whatsapp ग्रुप है। जैसे ही कुछ होता वो सब तैयार हों जाते है, पर कुछ दोपहर मे सोते होंगे या उदास रहते होंगे या कुछ अपना linkedin अपडेट करते होंगे तो देर हों जाती होगी।  

उस दिन रानी आंटी के जाने के बाद एक कविता मैंने लिखी, जैसे ये autobiography लिख रहा हूँ। 

"

माँ उदास दोपहर मे सो रही हैं।
पिता को retirement में बचा है एक साल
बजता है फोन, 
रेलवे में क्लर्क लगा हैं, पड़ोस में कोई
सामने रखे है, दो सुंदर बूंदी मोतीचूर
हुम update करते है बार बार एक ही CV
कितने NGO में किया कितना एहसान, 
कितनी बार रहा 100% attendence 
निराशा नाम की चिड़िया कमरे में आकर
चोंच में फंसा लेती तिनके मोतीचूर के,

 

इन सब के बीच,  दोपहर दिन का उदास वक्त है।

 


mother with her mother, 
2021




 


मंगलवार, 8 जून 2021

घर शहर

















सड़क

तुम्हारा जाना,

मेरा ऐसे छूट जाना

जैसे हर साल छूट जाती है 

गाँव की एक ख़राब सड़क

जिस पर लड़ा जा सके अगला चुनाव।


घर


घर एक बड़ा सपना था।

जिसके लिए बाकि सपनों को छोटा मानकर

किसी सुबह काम पर जाते हुए,

बस, कार, मेट्रो को खिड़की से नीचे फेंक दिया है।

तमाम छोटे सपनों का बलिदान है बड़ा सपना,

और उन्हीं बड़े सपनों के बाद उन छोटे सपनों को 

ढूंढ रहे हैं उन्हीं खिड़कियों में,

काम पर जाते वक़्त।






कोई एक को।

कोई एक कहूँगा  साथ चलेंगे,  मैं अकेला नही जाना चाहता पहाड़।  अकेले देखे जाने का डर, हमेशा लगता है, पहाड़ को।  हम जब भी मिले,  कोई एक को लेकर म...