सड़क
तुम्हारा जाना,
मेरा ऐसे छूट जाना
जैसे हर साल छूट जाती है
गाँव की एक ख़राब सड़क
जिस पर लड़ा जा सके अगला चुनाव।
घर
घर एक बड़ा सपना था।
जिसके लिए बाकि सपनों को छोटा मानकर
किसी सुबह काम पर जाते हुए,
बस, कार, मेट्रो को खिड़की से नीचे फेंक दिया है।
तमाम छोटे सपनों का बलिदान है बड़ा सपना,
और उन्हीं बड़े सपनों के बाद उन छोटे सपनों को
ढूंढ रहे हैं उन्हीं खिड़कियों में,
काम पर जाते वक़्त।
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें