कोई एक कहूँगा
साथ चलेंगे,
मैं अकेला नही जाना चाहता पहाड़।
अकेले देखे जाने का डर,
हमेशा लगता है,
पहाड़ को।
हम जब भी मिले,
कोई एक को लेकर मिले।
दोनों के अकेले मिलने मे
दोनों के अकेलेपन के मिल जाने का डर।
बचपन में दूध लाने पर बचे छुट्टे पैसों की तरह ज़िंदगी की ये कुछ छुट्टी कविताएँ हैं ।
कोई एक कहूँगा
साथ चलेंगे,
मैं अकेला नही जाना चाहता पहाड़।
अकेले देखे जाने का डर,
हमेशा लगता है,
पहाड़ को।
हम जब भी मिले,
कोई एक को लेकर मिले।
दोनों के अकेले मिलने मे
दोनों के अकेलेपन के मिल जाने का डर।
कोई भी,
(बहुत दूर का एक गाँव)
एक भूरा पहाड़
बच्चा भूरा और बूढ़ा पहाड़
साँझ को लौटती भेड़
दूर से लौटती शाम
रात से पहले का नीला पहाड़
था वही भूरा पहाड़।
भूरा बच्चा,
भूरा नहीं,
नीला पहाड़, गोद में लिए, आँखों से।
उतर आता है शहर
बाजार में थैला बिछाए,
बीच में रख देता है, नीला पहाड़।
और बेचने के बाद का,
बचा नीला पहाड़
अगली सुबह
जाकर मिला देता है,
उसी भूरे पहाड़ में।
आम के 6 पेड़ थे
यहीं बताते थे पापा, हर बार
दो मेरे, दो छोटे भाई के, एक उनका
और एक माँ का पेड़।
स्टेशन से घर के बीच में
हर बार दिखाते थे
कभी तीन चौसा, दो दशहरी एक आम्रपाली
कभी तीन आम्रपाली एक चौसा दो दशहरी
कभी नहीं देखे
कभी नहीं चढ़े
घर की जल्दी में
शहर के ही खायें आम
माना की ये है, छः पेड़ वहीं
एक टूट कर बिका है, अभी
बूढ़ा आम पेड़
अब बस यहीं,
किसके हिस्से का पेड़
जो बूढ़ा हुआ, टूट गया और बिक गया।
बेमौसम की बरसात में
हर कोई नही खाता पकौड़े।
किसान ज़हर कहा लेते हैं
नेता खा लेते हैं flood relief fund
और लड़के प्यार में झूठी माँ कसम
ताकि शाम को किसी के साथ खा सके subway।
लड़की
एक लड़की घर लौट रही हैं
कथित वाक्य में लड़की घर लौट रही हैं,
पूर्णतः लौटी नही हैं।
लौट रही है और सही सलामत लौट जाएगी
के भेद को समाज कहा जाएगा।
तुम्हे याद करना
19 के पहाड़े जितना कठिन हैं
और भूल जाना है
जैसे माँ जरूरी बताया हुआ कोई काम
तुम्हे छुआ तो जाना balance sheet tally कर लेने से भी और बहुत सुख बाकी है दुनिया मे
पर एक सुबह तुम आसानी से उठकर चली गई
बस उतनी ही आसानी से मैंने 2 का पहाड़ा याद किया था।
प्रेम कविता
कितनी ही प्रेम कविताएँ
प्रेम पत्र बनकर
किताबों में मर गई या जला दी गई।
नासमझ
तुम्हारे जाने का कारण उतना ही नासमझ हैं
जितना बचपन की की ये बहस
अगर पृथ्वी घूमती हैं
तो हम क्यों नही घूमते।
इंतज़ार
फिर काटे गए हज़ारो पेड़
सैंकड़ो बनाए गए उनके कागज़
पचासों लिखी उन पर चिट्ठियां।
स्याही से रंगे हाथों ने
करोड़ो बार लिखा उन पर प्रिय/ प्रियवर
और फिर गलत पते पर भेजकर
मरते दम तक किया हमने इंतज़ार।
"
माँ उदास दोपहर मे सो रही हैं।पिता को retirement में बचा है एक सालबजता है फोन,रेलवे में क्लर्क लगा हैं, पड़ोस में कोईसामने रखे है, दो सुंदर बूंदी मोतीचूरहुम update करते है बार बार एक ही CVकितने NGO में किया कितना एहसान,कितनी बार रहा 100% attendenceनिराशा नाम की चिड़िया कमरे में आकरचोंच में फंसा लेती तिनके मोतीचूर के,
इन सब के बीच, दोपहर दिन का उदास वक्त है।
मेरा ऐसे छूट जाना
जैसे हर साल छूट जाती है
गाँव की एक ख़राब सड़क
जिस पर लड़ा जा सके अगला चुनाव।
घर एक बड़ा सपना था।
जिसके लिए बाकि सपनों को छोटा मानकर
किसी सुबह काम पर जाते हुए,
बस, कार, मेट्रो को खिड़की से नीचे फेंक दिया है।
तमाम छोटे सपनों का बलिदान है बड़ा सपना,
और उन्हीं बड़े सपनों के बाद उन छोटे सपनों को
ढूंढ रहे हैं उन्हीं खिड़कियों में,
काम पर जाते वक़्त।
कोई एक कहूँगा साथ चलेंगे, मैं अकेला नही जाना चाहता पहाड़। अकेले देखे जाने का डर, हमेशा लगता है, पहाड़ को। हम जब भी मिले, कोई एक को लेकर म...